होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों पर हमले बढ़े: ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से एक हफ्ते में दर्ज हुए सबसे ज्यादा हमले1 min read
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खाड़ी देशों से तेल निर्यात बढ़ाने के प्रयासों के बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर हमलों की रफ्तार खतरनाक रूप से तेज हो गई है। मैरीटाइम सिक्योरिटी सोर्सेज के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में कम से कम 12 बड़े हमले दर्ज किए गए हैं।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के सबसे अहम मार्ग माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों और टैंकरों के लिए संकट गहराता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते (28 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच) तेल, एलएनजी और एलपीजी ले जाने वाले टैंकरों पर हमलों की संख्या इस साल 28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।
मैरीटाइम सिक्योरिटी और ट्रैकिंग सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस एक हफ्ते के दौरान कम से कम 12 अलग-अलग हमलों को रिकॉर्ड किया गया है। वहीं, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी (IMO) भी इन क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही घटनाओं की निगरानी कर रही है। इससे पहले जुलाई महीने में एक हफ्ते के भीतर अधिकतम 8 घटनाएं दर्ज की गई थीं, लेकिन इस बार का आंकड़ा उन सभी रिकॉर्ड को पार कर गया है।
ईरान की बढ़ती गतिविधियां और नाविकों पर खतरा
अमेरिकी नौसेना के नेतृत्व वाले ज्वॉइंट मैरीटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर (JMIC) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा जलडमरूमध्य में ड्रोन उड़ाना, जहाजों की निगरानी करना और रेडियो के जरिए चेतावनी देने जैसी हरकतें लगातार जारी हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य प्रमुख शिपिंग लेन पर अपना दबदबा कायम रखना और गुजरने वाले जहाजों पर दबाव बनाना है।
हाल ही में इस संघर्ष का असर भारत पर भी देखने को मिला है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, पनामा के झंडे वाले एक ऑयल टैंकर ‘ऑन पीस’ (On Peace) पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते वक्त एक अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ, जिसमें करीब 12 क्रू मेंबर (नाविक) घायल हो गए।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
शिपिंग डेटा से पता चलता है कि सितंबर के आधे हिस्से में खाड़ी के तेल निर्यातकों ने युद्ध-पूर्व के स्तर को पार कर लिया था, लेकिन इन ताजा हमलों और लॉजिस्टिकल बाधाओं के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता फिर से बढ़ गई है। यदि यह सिलसिला थमता नहीं है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संकट गहरा सकता है.
Source: Reuters
